सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका, शिक्षिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर (छत्तीसगढ़)
जीवन में न कभी हँसना छोड़ना चाहिए, न मुस्कुराना और न ही आगे बढ़ना। जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया, इसका हिसाब करने बैठे तो जिंदगी बीत जाएगी पर हिसाब पूरा नहीं होगा। इसलिए बेहतर है, जो पाया है उसी में अपना सर्वस्व समर्पित कर जी भर के जी लीजिए। और जो खो गया, अगर आपको पता है कि वो वापस नहीं मिलेगा, तो फिर उस बात का अफसोस करना अपने वर्तमान और भविष्य दोनों को बर्बाद करने के समान है। क्योंकि जब हम पछतावा करते हैं और मन में किसी बात को रखकर दुखी होते हैं, उस स्थिति में हमारी सकारात्मक ऊर्जा हजारों गुना कम हो जाती है।
जब हम अधिक मात्रा में दुख को महसूस करने लगते हैं, तो शरीर स्वयं ही कमजोर हो जाता है। आपके साथ रहने वाले भी आपको देखकर नकारात्मक भाव से भर जाते हैं। जो आपके प्रिय हैं, आपके आश्रित हैं, उन्हें भी इसका फर्क पड़ता है। सुख-दुख के संगम से बना यह जीवन कभी भी एक-सा नहीं रहेगा। जब यह निश्चित है कि जीवन के बाद मृत्यु है, फिर जरूरत से ज्यादा किसी एक पक्ष पर हम आसक्त होने लगते हैं, वहीं घातक होता है। जब आप खुश हैं तो जीने की कई वजहें मिल जाएंगी, लेकिन विपरीत परिस्थिति में चारों तरफ सिर्फ अंधेरा दिखाई देता है, उम्मीद बिखर जाती है, विश्वास खो जाता है। एक बात याद रखिए, सुख के सब साथी, दुख में न कोई, जिसने भी ये गीत लिखा है, एकदम सत्य लिखा है।
इसलिए आप खुद उठिए और पूरी शक्ति लगा दीजिए अपने आप को फिर से मजबूत बनाने के लिए। कोई बात नहीं, आपके पास धन-दौलत नहीं है, कोई आपका साथ नहीं दे रहा, आप हार न मानें। मन से दुख को निकालकर कहीं और रख दीजिए और तैयार हो जाइए फिर से संघर्ष के लिए। नकारात्मक बातों को भूल जाइए। इतना तो तय है, इस सफर में आप अकेले ही रहेंगे और इस सफर में जीवित रहते तक ही सब अपने हैं, जिसका जब बुलावा आएगा उसे जाना पड़ेगा। तो आदत डालिए अकेले ही चलने की।
कभी भी कायराना हरकत न करें। मरने का खयाल अगर आपके जेहन में आता भी है तो एक बार जीने का, संभलने का और हौसला भरने का प्रयास जरूर करें। सब मन का ही खेल है, आप जिस नजर से देखेंगे दुनिया को, दुनिया आपको वैसी ही दिखाई देगी। इसलिए अच्छा देखें, अच्छा बोलें व अच्छा सुनें। अपने स्तर से ऊपर उठिए, दुनिया बहुत बड़ी है, जहां आपको जाना है आप जा सकते हैं, बस शर्त यह है कि कहां जाना है ये पहले से तय हो।
दूसरों की सोच के अनुसार अपने आप को न ढालें, अपना भी एक वजूद रखें, एक मंजिल हो जिसे पाने की जिद और ख्वाहिश जरूर हो। लक्ष्य के बिना हर पल को जीना सिर्फ पशु-तुल्य जीवन है। अपनी जीवन की धारा को सदैव निर्मल और स्वच्छ बहने दीजिए, फिर देखिए दुनिया का कोई भी दुख-तकलीफ आपको स्पर्श नहीं कर पाएगी। हर गम से जुदा रखिए अपना अंदाज। आप जो चाहें, आप कर सकते हैं, क्योंकि आप साधारण नहीं हैं, उस शक्तिशाली पूरे ब्रह्मांड के पालनहार की आप रचना हैं। फिर कैसे आप कमजोर हो सकते हैं। लोगों की बातों का, तानों का, छल-प्रपंच और दुनियादारी से आपका कोई वास्ता न हो।
पहले खुद में भरपूर क्षमता भरिए, अपनों के करीब रहिए, फिर जुड़ जाइए हर उस कार्य से जो आपको खुशी प्रदान करे, जो आपके एहसास को स्पर्श करे। जनहितकारी, कल्याणकारी कार्य भी आप तभी कर सकते हैं जब आप मानसिक रूप से एकदम स्वस्थ हैं, इसलिए पहली जिम्मेदारी खुद का ख्याल रखना है। शिकायत करना छोड़ दीजिए, अपने आप से, परिवार, पड़ोस, मित्र, समाज और राष्ट्र से, सब सही है अपनी जगह। आप जितना अधिक दूसरों से उम्मीद करेंगे, उतने ज्यादा दुखी होंगे।
इसलिए जो आपके साथ गलत व्यवहार भी करते हैं, आप उन्हें भूल जाइए, ज्यादा किसी बात पर ध्यान केंद्रित न करें। सभी अपने कर्मों की सजा पाते हैं, आप ही जज और वकील न बनें। अपने जीवन को मुकदमे का स्थान मत बनाइए। जब सभी के सही-गलत का ठेका आप ले लेते हैं, तभी आप विवादों से घिर जाते हैं और फैसला आप कर नहीं पाते, संदेह से घिर जाते हैं। फिर होता क्या है, प्रपंच, जिससे उबरना मुश्किल हो जाता है। अपने ही बनाए दुख के घेरे से हम आजीवन नहीं निकल पाते और दोष देते हैं दूसरों को। अधिक सुख की चाह, नकारात्मक भाव, दूसरों से उम्मीद ही दुख देती है।इसलिए जितना हो सके अपनी हिम्मत से और सकारात्मक होकर कार्य करें। असंभव कुछ भी नहीं, बस करने की, लड़ने की, जूझने की आपमें चाह होनी चाहिए। सरलता, सहजता और सादगी हमारे जीवन में अधिक मायने रखती है। सरल सहज रहें, सादगी से जिएं।
