पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव*
आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज के पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य*
परम पूज्य शंकराचार्य जी, आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी, महंत श्री रवीन्द्र पुरी जी] आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी बालकानन्द जी, आचार्य लोकेश मुनि जी, आचार्य बालकृष्ण जी और अन्य पूज्य संतों का पावन सान्निध्य*
श्री सिद्धपीठ दक्षिण काली मन्दिर, नील धारा गंगा तट, चन्डी घाट, हरिद्वार में आयोजित*
ऋषिकेश। श्री सिद्धपीठ दक्षिण काली मंदिर, नील धारा गंगा तट, चंडी घाट, हरिद्वार में आयोजित आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज के पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव ने आध्यात्मिक चेतना, सनातन मूल्यों और राष्ट्रबोध को एक सशक्त दिशा प्रदान की। यह आयोजन एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही समाज, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति जागरूक दायित्व का प्रेरक उद्घोष है।
इस पावन अवसर पर परम पूज्य शंकराचार्य जी, आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, महंत श्री रविन्द्र पुरी जी, आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी बालकानन्द जी, आचार्य लोकेश मुनि जी, आचार्य बालकृष्ण जी सहित अनेक पूज्य संत, महापुरूष एवं महात्माओं का गरिमामयी सान्निध्य प्राप्त हुआ। संत समाज की एकता, साधना और सेवा की परंपरा इस महोत्सव में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। दिव्यता, अनुशासन और सनातन परंपरा की गरिमा से ओतप्रोत वातावरण में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त हुई।
पूज्य संतों ने अपनी ओजस्वी, स्पष्ट और चिंतनशील वाणी से सभी को सम्बोधित किया। पूज्य स्वामी जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आज का समय केवल साधना का नहीं, बल्कि सजग, सज्जन और सक्रिय नागरिक बनने का समय है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वर्तमान समय में वोट सत्ता के लिये नहीं, सत्य के लिये करें; स्वार्थ के लिये नहीं, सनातन मूल्यों के लिये करें और किसी व्यक्ति के लिये नहीं, राष्ट्र के भविष्य के लिये करें। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में हिंसा के बाद हिंसा, हत्या के बाद हत्या, ऐसी निर्मम हत्याएँ, पहले नरसंहार फिर दुःविचार, घरों को जलाना, महिलाओं पर बलात्कार, ये सारी घटनाएँ, ये सारी कड़ियाँ आने वाले नये संकट का संदेश देती हैं, इसलिये राष्ट्र के लिये, सनातन के लिये सबको एक साथ मिलकर खड़े होना होगा।
सनातन है तो हम सब हैं, सनातन है तो मानवता है, सनातन है तो धर्म है, त्यौहार हैं, पर्व हैं और सारे उत्सव हैं, सनातन नहीं तो सब कुछ है, सनातन है तो सब कुछ बचा रहेगा। सनातन है तो जियो व जीवन दो के मूल्य हैं, वसुधैव कुटुम्बकम् के मंत्र हैं, सर्वे भवन्तु सुखिनः के दिव्य मंत्र हैं।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में मतदान केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है। जब हम अपने मत का प्रयोग करते हैं, तो हम केवल सरकार नहीं चुनते, बल्कि देश की दिशा, संस्कृति की सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करते हैं इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि वह विवेक, मूल्य और राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखकर निर्णय ले।
उन्होंने कहा कि आज हमारे मन, विचार और कर्म में राष्ट्रहित, राष्ट्रप्रथम और राष्ट्रप्रेम का भाव स्पष्ट और दृढ़ होना चाहिए। यह समय तटस्थ बने रहने का नहीं है। जब सत्य पर आघात हो, जब सनातन मूल्यों को कमजोर करने के प्रयास हों और जब राष्ट्र की चेतना को भ्रमित किया जा रहा हो तब मौन को भी मुखर होना होगा। ऐसे समय में मौन को तोड़कर सत्य के पक्ष में मुखर होना ही सच्ची साधना है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि सन्यास का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार के लिये जीना है। सन्यास का वास्तविक स्वरूप है, स्वार्थ का त्याग, सेवा का स्वीकार और सत्य के लिये निर्भीक खड़ा होना। एक सन्यासी का जीवन समाज को दिशा देता है और राष्ट्र की आत्मा को जाग्रत करता है।
पूज्य संतों ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि भारत की आत्मा सनातन संस्कृति में निहित है। जब तक यह संस्कृति सुरक्षित है, तब तक राष्ट्र सशक्त और समृद्ध रहेगा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आधुनिकता के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहें और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को पहचानें।
पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव ने स्पष्ट संदेश दिया कि आज भारत को ऐसे नागरिकों और साधकों की आवश्यकता है जो सत्यनिष्ठ, राष्ट्रनिष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ हों। यही सच्ची सन्यास चेतना है और यही राष्ट्र निर्माण का आधार।
